“गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥”
— कबीर
जब मैं इन पंक्तियों को पढ़ता हूँ, तो मुझे अपने शिक्षक याद आते हैं। वे चेहरे, जिनके सामने बैठकर मैंने अक्षरों को शब्दों में और शब्दों को अर्थों में बदलना सीखा था। समय बीत गया, कक्षाएँ और किताबें बदल गईं, शिक्षा के साधन भी बदल गए, लेकिन उन शिक्षकों की कही हुई कई बातें आज भी मेरे भीतर जीवित हैं। शायद यही शिक्षक होने की सबसे बड़ी सार्थकता है। हम अपने विद्यार्थियों को पढ़ाते हुए अनजाने में उनके जीवन का हिस्सा बन जाते हैं। भारत में प्रत्येक वर्ष 5 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है। यह दिन देश के महान शिक्षाविद्, दार्शनिक और भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। जब उनके विद्यार्थियों और प्रशंसकों ने उनका जन्मदिन मनाने की इच्छा व्यक्त की, तो उन्होंने इसे अपने जन्मदिन के बजाय शिक्षक दिवस के रूप में मनाने का सुझाव दिया। तभी से 5 सितंबर हमारे लिए शिक्षकों के प्रति सम्मान, कृतज्ञता और उनके योगदान को स्मरण करने का विशेष दिन बन गया। मैं एक शिक्षक हूँ। यह मेरे लिए केवल एक पेशे का परिचय नहीं, बल्कि एक ज़िम्मेदारी और निरंतर आत्ममंथन है। जब मैं कक्षा में प्रवेश करता हूँ, तो मेरे सामने केवल विद्यार्थी नहीं होते बल्कि उनके बहुत सारे सपने भी होते हैं। किसी की आँखों में डॉक्टर बनने का सपना है, किसी की आँखों में वैज्ञानिक बनने का, कोई लेखक बनना चाहता है, कोई खिलाड़ी या कलाकार। कुछ विद्यार्थी ऐसे भी होते हैं, जो अभी अपनी मंज़िल को लेकर अनिश्चित होते हैं। एक शिक्षक के रूप में मेरा काम केवल पाठ्यक्रम पूरा करना नहीं, बल्कि इन सपनों को पहचानना और उन्हें सही दिशा देना भी है। मेरे लिए शिक्षक की सबसे बड़ी सफलता विद्यार्थियों के अंकों या ऊँचे पदों में नहीं, बल्कि उस क्षण में दिखाई देती है जब कोई विद्यार्थी जीवन के कठिन मोड़ पर सही निर्णय लेता है, असफल होने के बाद भी हार नहीं मानता या वर्षों बाद लौटकर कहता है:
“सर, आपकी कही हुई एक बात मुझे आज भी प्रेरित करती है।” तब लगता है कि कक्षा में बिताया गया हर क्षण सार्थक था। एक शिक्षक के शब्द किसी विद्यार्थी के आत्मविश्वास को बढ़ा भी सकते हैं और अनजाने में उसे तोड़ भी सकते हैं। उसकी डाँट अनुशासन सिखा सकती है और उसका प्रोत्साहन टूटते हुए मन को संभाल सकता है। इसलिए शिक्षक होना किसी विशेष अधिकार का नहीं, बल्कि बड़ी ज़िम्मेदारी का नाम है।
शिक्षक होने के साथ-साथ मैंने यह भी समझा है कि हर विद्यार्थी एक जैसा नहीं होता। किसी को एक बार समझाने पर बात समझ में आ जाती है, तो किसी को कई बार समझाना पड़ता है। कोई प्रश्न पूछने में संकोच करता है, तो कोई लगातार प्रश्न करता है। किसी को घर से पढ़ाई का अनुकूल वातावरण मिलता है, तो कोई अनेक कठिनाइयों के बीच विद्यालय तक पहुँचता है।
कबीर की ये पंक्तियाँ शिक्षक और विद्यार्थी के संबंध को बहुत गहराई से परिभाषित करती हैं:
“गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ि-गढ़ि काढ़ै खोट।
अंतर हाथ सहार दे, बाहर बाहै चोट॥”
एक शिक्षक के लिए विद्यार्थी कुछ वैसा ही होता है, जैसे कुम्हार के लिए मिट्टी। कुम्हार मिट्टी को धैर्यपूर्वक गूँथता है, चाक पर रखता है और धीरे-धीरे उसे एक आकार देता है। कभी उसे अपने हाथ का दबाव बढ़ाना पड़ता है, कभी हल्का करना पड़ता है। वह जानता है कि हर मिट्टी की अपनी प्रकृति होती है। ठीक इसी तरह शिक्षक भी अपने विद्यार्थियों की क्षमता को पहचानता है, उनकी कमियों को समझता है और उनके भीतर छिपी प्रतिभा को उभारते हुए उनके व्यक्तित्व को आकार देता है। कभी उसकी डाँट उस दबाव की तरह होती है, जो मिट्टी को बिगड़ने से बचाती है और कभी उसका प्रोत्साहन उस हाथ की तरह, जो टूटते हुए आकार को संभाल लेता है। कुम्हार का बनाया घड़ा जब उसके हाथों से निकल जाता है, तो उसकी यात्रा समाप्त नहीं होती; बल्कि वहीं से उसका उपयोग शुरू होता है। उसी तरह विद्यार्थी भी एक दिन शिक्षक की कक्षा से निकलकर जीवन की विशाल दुनिया में जाता है। उसके निर्णय और उसकी राह अलग हो सकती है, लेकिन शिक्षक के दिए संस्कार, अनुशासन और दृष्टि उसके भीतर हमेशा जीवित रहते हैं। शायद शिक्षक और कुम्हार के बीच सबसे सुंदर समानता यही है कि दोनों निर्माण करते हैं, किन्तु अपने लिए नहीं। कुम्हार मिट्टी को आकार देता है और शिक्षक ज्ञान, संस्कार और अनुभव से व्यक्तित्व का निर्माण करता है। वह केवल आज के विद्यार्थी को नहीं गढ़ता, वह आने वाले कल के समाज को आकार देता है। आज शिक्षा की दुनिया तेज़ी से बदल रही है। ब्लैकबोर्ड और चॉक की जगह स्मार्ट बोर्ड, इंटरनेट, ऑनलाइन कक्षाएँ और कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने ले लिया है। एक क्लिक पर दुनिया भर की जानकारी उपलब्ध है। ऐसे समय में प्रश्न उठता है कि जब ज्ञान के इतने साधन मौजूद हैं, तब शिक्षक की भूमिका क्या रह गई है? इसका उत्तर शिक्षा और सूचना के अंतर में छिपा है। सूचना हमें बता सकती है कि क्या है, लेकिन ज्ञान हमें यह समझाता है कि उसका अर्थ क्या है। तकनीक उत्तर उपलब्ध करा सकती है, लेकिन सही प्रश्न पूछने की क्षमता, विवेक, संवेदना और नैतिक दृष्टि विकसित करना अभी भी शिक्षक का दायित्व है। एक विद्यार्थी को यह बताना आसान है कि परीक्षा में कितने अंक आए हैं; लेकिन उसे यह समझाना अधिक महत्वपूर्ण है कि उन अंकों से उसका व्यक्तित्व तय नहीं होता। सफलता में विनम्र रहना और असफलता में टूटना नहीं, यही शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य है। आज जब बच्चे प्रतिस्पर्धा, अपेक्षाओं और भविष्य की चिंता के बीच बड़े हो रहे हैं, तब शिक्षक की संवेदनशील भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। शिक्षा का उद्देश्य केवल अधिक अंक और बेहतर नौकरी नहीं, बल्कि ऐसा नागरिक तैयार करना होना चाहिए जो अपने अधिकारों के साथ कर्तव्यों को समझे, सफलता के साथ संवेदना को महत्व दे और अपने विकास के साथ समाज के विकास की चिंता भी करे।
महात्मा गांधी ने शिक्षा के व्यापक उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए कहा था:
“शिक्षा से मेरा अभिप्राय बच्चे और मनुष्य के शरीर, मन और आत्मा में निहित सर्वोत्तम गुणों का चहुँमुखी विकास है।”
एक शिक्षक के रूप में मुझे लगता है कि यही शिक्षा की वास्तविक आत्मा है। यदि शिक्षा केवल परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करने तक सीमित रह जाए, तो वह अधूरी है। शिक्षा तब सार्थक होती है, जब वह विद्यार्थी के ज्ञान के साथ उसके विवेक को, प्रतिभा के साथ उसके चरित्र को और सफलता के साथ उसकी संवेदनशीलता को भी विकसित करे।
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का शिक्षा संबंधी विचार भी शिक्षा की व्यापक भूमिका को सामने रखता है। उनके अनुसार शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान या जानकारी प्रदान करना नहीं है, बल्कि व्यक्ति के व्यक्तित्व, विवेक और सृजनात्मक क्षमता का विकास करना भी है, ताकि वह जीवन की परिस्थितियों और चुनौतियों का प्रभावी ढंग से सामना कर सके। एक शिक्षक के रूप में मैं चाहता हूँ कि मेरे विद्यार्थी केवल प्रश्नों के उत्तर याद न करें, बल्कि जीवन के प्रश्नों का सामना करना भी सीखें। वे केवल प्रतियोगिता में आगे निकलने की कोशिश न करें, बल्कि कठिन परिस्थितियों में भी सही निर्णय लेने की क्षमता विकसित करें।
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की पंक्तियाँ संघर्ष और आत्मविश्वास की प्रेरणा देती हैं:
“मानव जब ज़ोर लगाता है,
पत्थर पानी बन जाता है।”
और इसी भावना को सोहनलाल द्विवेदी की प्रसिद्ध पंक्तियाँ और दृढ़ता प्रदान करती हैं:
“लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।”
शिक्षक इसी विश्वास को विद्यार्थियों के भीतर पैदा करता है। वह असफलता को अंत नहीं, बल्कि सीखने का अवसर समझना सिखाता है। वह विद्यार्थी को हर बार गिरने से बचाने के बजाय गिरकर स्वयं उठना सिखाता है, क्योंकि जीवन में सफलता की कोई ऐसी पाठ्यपुस्तक नहीं होती, जिसमें हर प्रश्न का उत्तर पहले से लिखा हो। शिक्षक का प्रभाव केवल उसके पढ़ाए विषय तक सीमित नहीं होता। विद्यार्थी शिक्षक के व्यवहार से भी सीखता है। वह देखता है कि शिक्षक कठिन परिस्थिति में कैसे धैर्य रखता है, दूसरों के साथ कैसा व्यवहार करता है, ग़लत बात के सामने कैसे खड़ा होता है और अपने दायित्वों को कितनी ईमानदारी से निभाता है। इसीलिए शिक्षक का व्यक्तित्व स्वयं एक जीवंत पाठ्यपुस्तक बन जाता है। शिक्षक दिवस पर हम अपने गुरुजनों को फूल देते हैं, शुभकामनाएँ देते हैं और समारोह आयोजित करते हैं। यह सम्मान आवश्यक है, लेकिन शिक्षक के प्रति सच्चा सम्मान केवल एक दिन के आयोजन से पूरा नहीं होता। उनके द्वारा दिए गए संस्कारों को अपने जीवन में उतारना ही उनके प्रति वास्तविक सम्मान है। मैं जानता हूँ कि मेरे सभी विद्यार्थी जीवन में समान ऊँचाइयों तक नहीं पहुँचेंगे। उनकी मंज़िलें अलग होंगी, उनके रास्ते अलग होंगे और उनकी सफलताओं की परिभाषाएँ भी अलग होंगी। लेकिन मेरी अभिलाषा यही है कि जब वे मेरी कक्षा से निकलकर जीवन की बड़ी दुनिया में जाएँ, तो उनके हाथ में केवल डिग्री न हो, उनके भीतर एक मजबूत चरित्र भी हो। क्योंकि अंततः शिक्षा का सबसे बड़ा उद्देश्य केवल यह नहीं कि विद्यार्थी जीवन में क्या हासिल करता है; बल्कि यह है कि वह उस उपलब्धि का उपयोग कैसे करता है और किस तरह का मनुष्य बनता है। मैं एक शिक्षक हूँ। मैं भविष्य की गारंटी नहीं दे सकता, लेकिन भविष्य के लिए तैयारी अवश्य कर सकता हूँ। मैं प्रत्येक विद्यार्थी की राह आसान नहीं कर सकता, लेकिन उसे कठिन रास्तों पर चलने का साहस दे सकता हूँ। मैं उसके जीवन की हर समस्या हल नहीं कर सकता, पर उसे समस्याओं से जूझना ज़रूर सिखा सकता हूँ। और शायद शिक्षक होने की सबसे बड़ी खुशी यही है कि हमारी कक्षा से निकलने वाले विद्यार्थी एक दिन हमसे आगे निकल जाएँ। उस दिन हमारी हार नहीं होती, बल्कि हमारे द्वारा दी गई शिक्षा की जीत होती है, क्योंकि शिक्षक अपने विद्यार्थियों में केवल आज नहीं देखता, वह उनमें आने वाला कल देखता है।
सुल्तान अली गहलोत
कवि एवं शिक्षक
पूर्व छात्र, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़, (उ.प्र.)
